पिछली एक सदी की तस्वीरों से खुल रहे हैं सूर्य के बारे में नये रहस्य                                                                 

      

सौरमंडल

सौरमंडल के केंद्र में स्थित सूर्य एक ऐसा तारा है, जिसके चारों ओर पृथ्वी समेत सौरमंडल के अन्य घटक चक्कर लगाते रहते हैं। दूरबीन से देखने पर इस गैसीय पिंड की सतह पर कुछ धब्बे दिखाई पड़ते हैं, जिन्हें सौर-कलंक या सौर-धब्बे कहा जाता है। समय के साथ इन धब्बों के स्थान में परिवर्तन देखने को मिलता है। इसी आधार पर वैज्ञानिक मानते हैं कि सूर्य पूरब से पश्चिम की ओर अपने अक्ष पर घूर्णन करता है। पिछली एक सदी के दौरान ली गई सूर्य की डिजिटल तस्वीरों और फिल्मों की मदद से भारतीय वैज्ञानिक सौर-धब्बों का पता लगाकर सूर्य के घूर्णन का अध्ययन कर रहे हैं। इस अध्ययन में कई नये और दिलचस्प तथ्य उभरकर आ रहे हैं।

वैज्ञानिकों का दावा है कि इस अध्ययन में उभरे तथ्यों से सूर्य के भीतरी हिस्से में उत्पन्न होने वाले चुंबकीय क्षेत्र के अध्ययन में मदद मिल सकती है। उल्लेखनीय है कि सूर्य के भीतरी हिस्से में उत्पन्न होने वाले चुंबकीय क्षेत्र को सौर-धब्बों (सनस्पॉट) के लिए जिम्मेदार माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, सूर्य के चुंबकीय क्षेत्र के परिणामस्वरूप ही पृथ्वी पर ऐतिहासिक लघु हिमयुग (सौर-धब्बों का अभाव) जैसी चरम परिस्थितियां पैदा होती हैं। कहा यह भी जा रहा है कि यह अध्ययन सौर-चक्रों और भविष्य में इनमें होने वाले बदलावों का अनुमान लगाने में भी मदद कर सकता है।


पिछली एक सदी के दौरान ली गई सूर्य की डिजिटल तस्वीरों और फिल्मों की मदद से भारतीय वैज्ञानिक सौर-धब्बों का पता लगाकर सूर्य के घूर्णन का अध्ययन कर रहे हैं। इस अध्ययन में कई नये और दिलचस्प तथ्य उभरकर आ रहे हैं।

जिस प्रकार पृथ्वी और अन्य ग्रह सूरज की परिक्रमा करते हैं उसी प्रकार सूरज भी आकाश गंगा के केन्द्र की परिक्रमा करता है। समय के साथ सूर्य की भिन्न परिक्रमा गतियां उसके चुंबकीय क्षेत्र को जटिल बना देती हैं। यह जटिलता तीव्र स्थानीय चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न कर सकती है। जब सूर्य का चुंबकीय क्षेत्र जटिलता से उलझ जाता है, तब बहुत-से सौर-धब्बे निर्मित होते हैं। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि सूर्य की सतह पर 11 वर्ष की अवधि के लिए बनने वाले धब्बे सूर्य के भीतर सौर चुंबकत्व के अध्ययन का एकमात्र उपाय हैं, जिससे सौर परिक्रमा का आकलन किया जा सकता है।

शोधकर्ताओं ने एक सदी पुराने डिजिटल रूप में सहेजी गई फिल्मों और तस्वीरों की मदद से सौर-धब्बों का पता लगाकर सौर परिक्रमा का अध्ययन किया है। इस अध्ययन में विश्लेषित की जाने वाली तस्वीरें एवं फिल्में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग से संबद्ध भारतीय ताराभौतिकी संस्थान की कोडैकनाल सौर वेधशाला से प्राप्त किए गए हैं, जिन्हें अब डिजिटाइज कर दिया गया है।

सूर्य के घूर्णन से संबंधित मैन्यूअल आंकड़ों की तुलना डिजिटल डेटा से करने के बाद शोधकर्ता पहली बार बड़े और छोटे सौर-धब्बों (सनस्पॉट) के व्यवहार में अंतर कर पाने में सफल हुए हैं। उनका कहना है कि इस प्रकार के डिजिटाइज्ड डेटा की मदद से सौर-धब्बों में अंतर किया जा सकेगा और सौर चुंबकीय क्षेत्र और सौर-धब्बों के बारे में विस्तृत समझ विकसित हो सकेगी।

यह अध्ययन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्यरत स्वायत्त संस्थान आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान के शोधकर्ता बिभूति कुमार झा के नेतृत्व में किया गया है। शोधकर्ताओं में, मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर सोलर सिस्टम रिसर्च, जर्मनी और साउथवेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, अमेरिका के वैज्ञानिक भी शामिल हैं।


इंडिया साइंस वायर

ISW/USM/25/02/2021

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